करोड़ों के वन बजट पर उठे सवाल । कमीशन और कूटरचित बिलों के सहारे बंदरबांट का आरोप । ग्रामीणों के बैंक खातों को बनाया जरिया ?सामने आ सकती है बड़ी वित्तीय अनियमितता।

IMG-20260903-WA0030

करोड़ों के वन बजट पर उठे सवाल ।

कमीशन और कूटरचित बिलों के सहारे बंदरबांट का आरोप ।

ग्रामीणों के बैंक खातों को बनाया जरिया ?

वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के भुगतान की हो निष्पक्ष जांच।

सामने आ सकती है बड़ी वित्तीय अनियमितता।

छुरा/ गरियाबंद जिले में वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के विभिन्न मदों में खर्च किए जा रहे करोड़ों रुपये के बजट को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। आरोप है कि विभागीय योजनाओं के नाम पर स्वीकृत राशि को वास्तविक कार्यों में खर्च करने के बजाय कथित तौर पर कूटरचित बिल-वाउचर तैयार कर तथा ग्रामीणों के बैंक खातों में राशि का ऑनलाइन हस्तांतरण कर शासकीय राशि के दुरुपयोग का खेल चलाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य कैम्पा मद योजनान्तर्गत वित्तीय वर्ष 2022-23 में
बताया जा रहा है कि कथित व्यवस्था में ग्रामीणों के बैंक खातों को भुगतान का माध्यम बनाकर राशि उनके खाते में जमा की जाती है और इसके बदले 10 से 15 प्रतिशत तक कमीशन लिए जाने की बात सामने आ रही है। उच्च अधिकारियों को सप्रमाण शिकायत किए जाने के बाद अभी तक जांच प्रक्रिया में ग्रहण लगा हुआ है, मुख्यमंत्री हेल्प लाइन में शिकायत दर्ज कराई गई है,हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र एवं अधिकृत पुष्टि होना अभी बाकी है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी राशि के दुरुपयोग और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल जैसे गंभीर प्रश्न भी खड़े करेगा।
कागजों में काम, खातों में भुगतान का खेल?
वन विभाग द्वारा पौधरोपण, वन संरक्षण, जल एवं मृदा संरक्षण, वनों के विकास सहित अनेक योजनाओं पर प्रतिवर्ष बड़ी राशि खर्च की जाती है। इन योजनाओं में मजदूरी एवं हितग्राही भुगतान के लिए बैंक के माध्यम से राशि हस्तांतरित करना अपने आप में असामान्य नहीं है। छत्तीसगढ़ शासन की वित्तीय व्यवस्था में हितग्राही भुगतान के लिए इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर को पारदर्शिता के उद्देश्य से अपनाया गया है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या जिन ग्रामीणों के खातों में राशि भेजी गई, उन्होंने वास्तव में संबंधित कार्य किया था? क्या कार्यस्थल पर उतने मजदूर मौजूद थे? क्या मस्टर रोल, माप पुस्तिका, कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र और भुगतान अभिलेख एक-दूसरे से मेल खाते हैं? इन्हीं सवालों की निष्पक्ष जांच से कथित अनियमितताओं की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
कमीशन की चर्चा ने बढ़ाई चिंता
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि कुछ ग्रामीणों के बैंक खातों में राशि भेजकर बाद में उनसे राशि वापस लिए जाने अथवा कमीशन काटे जाने का दबाव बनाया जाता है। यदि ऐसा हुआ है तो बैंक खातों में हुए प्रत्येक लेनदेन की जांच, संबंधित ग्रामीणों के बयान और भुगतान से जुड़े मूल अभिलेख महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकते हैं।
सरकारी धन के लेनदेन में बैंक खाते के माध्यम से भुगतान होना पारदर्शिता की गारंटी तभी बनता है, जब लाभार्थी वास्तविक हो, कार्य वास्तविक हो और भुगतान कार्य के अनुपात में हो।
बिल-वाउचर की जांच से खुल सकता है राज
आरोपों की गंभीरता को देखते हुए वन मंडल के विभिन्न रेंजों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुए भुगतान की विशेष ऑडिट कराए जाने की मांग उठ सकती है। इसमें बिल-वाउचर, मस्टर रोल, बैंक स्टेटमेंट, भुगतान सूची, जीपीएस आधारित कार्यस्थल विवरण, फोटो, माप पुस्तिका तथा कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्रों का आपस में मिलान किया जाना जरूरी होगा।
छत्तीसगढ़ वित्त विभाग लगातार सरकारी धन के प्रबंधन और वित्तीय अनुशासन को लेकर दिशा-निर्देश जारी करता रहा है। वर्तमान वित्तीय निर्देशों में सरकारी बैंक खातों के प्रबंधन, निधियों के लेखांकन और धोखाधड़ी की घटनाओं को रोकने के लिए सुरक्षात्मक उपायों पर भी जोर दिया गया है।
जंगल के रक्षक पर ही उठे सवाल
वन अधिकारियों की जिम्मेदारी जंगल और वन संपदा की सुरक्षा के साथ-साथ शासन द्वारा उपलब्ध कराए गए बजट का नियमानुसार उपयोग सुनिश्चित करना भी है। ऐसे में यदि करोड़ों रुपये के बजट में फर्जीवाड़े, कूटरचित दस्तावेज या कमीशनखोरी के आरोप सामने आते हैं तो विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकारी खजाने से निकली करोड़ों की राशि वास्तव में जंगल और ग्रामीणों के विकास पर खर्च हुई या फिर कागजी कार्यवाही के सहारे राशि को इधर-उधर करने का माध्यम बनाया गया?
निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगी सच्चाई
मामले में विभागीय जांच के बजाय किसी स्वतंत्र एजेंसी अथवा उच्चस्तरीय समिति से जांच कराए जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। प्रत्येक भुगतान की बैंकिंग ट्रेल, संबंधित खाताधारकों के बयान और मौके पर हुए वास्तविक कार्य का भौतिक सत्यापन कराया जाए तो आरोपों की सच्चाई सामने आ सकती है।
यदि जांच में आरोप निराधार पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों को भी राहत मिलेगी, लेकिन यदि दस्तावेजों और बैंक लेनदेन में गड़बड़ी सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ-साथ कथित रूप से इस पूरी प्रक्रिया में शामिल अन्य लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि करोड़ों रुपये के वन बजट से जुड़े इन आरोपों पर शासन और विभाग के उच्चाधिकारी क्या कदम उठाते हैं और क्या वित्तीय अभिलेखों की निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविकता जनता के सामने लाई जाती है।