“कब्जे का किला ढहा!” — बेलसोंडा में करोड़ों की शासकीय भूमि से हटाया गया अवैध कब्जा, पूर्व सरपंच पर उठे सवाल!
महासमुंद – जिला मुख्यालय से लगे ग्राम पंचायत बेलसोंडा में सोमवार का दिन इतिहास बन गया, जब वर्षों से विवादों में घिरी करोड़ों रुपये मूल्य की शासकीय भूमि को प्रशासन और पंचायत ने संयुक्त कार्रवाई कर मुक्त करा लिया। खसरा नंबर 1661, 1651 और 1654 पर फैले अवैध कब्जों पर आखिरकार बुलडोज़र चला और पुलिस बल की मौजूदगी में कब्जा हटाने की कार्रवाई पूरी की गई।
इस पूरी कार्रवाई ने न केवल गांव में हलचल मचा दी, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में भी तीखी बहस छेड़ दी है। सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि जो लोग स्वयं को शासकीय भूमि के रक्षक बताते रहे, उन्हीं पर करोड़ों की जमीन कब्जाने के आरोप क्यों लगे?
करोड़ों की जमीन पर चला बुलडोज़र!
ग्राम पंचायत बेलसोंडा की शासकीय भूमि, जो मुख्य सड़क से लगी हुई है और जिसका बाजार मूल्य करोड़ों में आंका जा रहा है, लंबे समय से विवाद में थी। ग्रामीणों की शिकायतों और दस्तावेजी जांच के बाद प्रशासन ने मौके पर पहुंचकर सीमांकन कराया। पटवारी और राजस्व निरीक्षक (आर.आई.) की उपस्थिति में नक्शा और खसरे का मिलान हुआ।
जब सीमांकन में यह स्पष्ट हुआ कि जमीन शासकीय रिकॉर्ड में दर्ज है और उस पर निजी निर्माण या घेराबंदी की गई है, तब पंचायत ने पुलिस बल के सहयोग से कब्जा हटाने की प्रक्रिया शुरू की।
पूर्व सरपंच और उनके पति पर आरोप!
इस कार्रवाई का केंद्र बनीं ग्राम की पूर्व सरपंच श्रीमती भामिनी पोखन चंद्राकर और उनके पति पोखन चंद्राकर। आरोप है कि सड़क से लगी इस बहुमूल्य भूमि पर अवैध कब्जा किया गया था। ग्रामीणों का कहना है कि जिस भूमि की कीमत करोड़ों में है, उसे निजी उपयोग में लेने का प्रयास किया गया।
बताया जाता है कि कब्जा हटाने के दौरान पूर्व सरपंच और उनके पति ने विरोध दर्ज कराया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जेसीबी मशीन के सामने खड़े होकर कार्यवाही रोकने का प्रयास किया गया। कुछ देर तक धक्का-मुक्की और तीखी बहस भी हुई।
पुलिस बल की मौजूदगी में शांतिपूर्ण निष्पादन!
स्थिति तनावपूर्ण होती देख पुलिस बल को सक्रिय किया गया। थाना स्तर के अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर शांति व्यवस्था बनाए रखी। प्रशासनिक अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई पूर्णतः दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर की गई है।
पुलिस की मौजूदगी में आखिरकार जेसीबी ने अवैध निर्माण और घेराबंदी को हटाया। कुछ ही घंटों में वर्षों से कब्जे में रही भूमि पुनः शासकीय खाते में मुक्त घोषित कर दी गई।
‘कब्जा विरोधी’ छवि पर उठे सवाल!
गांव में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि पूर्व सरपंच श्रीमती भामिनी चंद्राकर ने अतीत में समाचार पत्रों और सार्वजनिक मंचों से अवैध कब्जों के खिलाफ आवाज उठाई थी। कई बार उन्होंने खुद को शासकीय भूमि संरक्षण की पैरोकार बताया था।
लेकिन अब जब उन्हीं पर शासकीय भूमि कब्जाने और हटाने की कार्रवाई में बाधा डालने के आरोप लगे हैं, तो ग्रामीणों में आक्रोश है। लोगों का कहना है कि “जो खुद को प्रहरी बताते रहे, वही यदि आरोपी बन जाएं तो जनता किस पर भरोसा करे?”
अनर्गल शिकायतों और पेपरबाजी का आरोप!
पंचायत पदाधिकारियों का आरोप है कि पूर्व सरपंच द्वारा लगातार समाचार पत्रों में बयानबाजी और शिकायतें की जाती रही हैं। उनका कहना है कि गलत तथ्यों के आधार पर प्रशासन को भ्रमित करने की कोशिश की गई।
पंचायत प्रतिनिधियों का यह भी दावा है कि जब भी अवैध कब्जों की बात उठती थी, तो ध्यान भटकाने के लिए अलग-अलग शिकायतें और आरोप लगाए जाते थे।
ग्रामीणों की प्रतिक्रिया!
ग्राम बेलसोंडा के कई ग्रामीणों ने इस कार्रवाई का स्वागत किया है। उनका कहना है कि शासकीय भूमि गांव की सामूहिक संपत्ति होती है और उसका संरक्षण हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
एक बुजुर्ग ग्रामीण ने कहा,
“यह जमीन गांव के विकास के काम आ सकती है—स्कूल, सामुदायिक भवन या अन्य सार्वजनिक कार्यों के लिए। अगर इसे निजी हाथों में जाने दिया जाता तो आने वाली पीढ़ियों का हक छिन जाता।”
प्रशासन का संदेश!
राजस्व विभाग के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, चाहे आरोपी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो।
उन्होंने कहा कि सीमांकन और दस्तावेजों के आधार पर निष्पक्ष कार्रवाई की गई है और भविष्य में भी ऐसे मामलों में सख्ती जारी रहेगी।
राजनीतिक हलकों में हलचल!
इस घटना के बाद स्थानीय राजनीतिक माहौल भी गर्म हो गया है। विपक्ष और समर्थक दोनों अपने-अपने तर्क दे रहे हैं। कुछ लोग इसे प्रशासन की निष्पक्ष कार्रवाई बता रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का परिणाम कह रहे हैं।
हालांकि प्रशासन ने साफ किया है कि कार्रवाई पूरी तरह राजस्व अभिलेखों और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार हुई है।
आगे क्या?
सूत्रों के अनुसार, शासकीय कार्य में बाधा डालने और सरकारी कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न करने के मामले में आगे कानूनी प्रक्रिया भी हो सकती है। यदि ऐसा होता है तो मामला और गंभीर रूप ले सकता है।
कानून का डंडा सब पर बराबर!
बेलसोंडा की इस घटना ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि शासकीय भूमि पर कब्जा करना चाहे कोई भी करे, अंततः कानून अपना काम करता है।
करोड़ों की कीमत वाली भूमि आज फिर से सरकारी रिकॉर्ड में मुक्त है। लेकिन इस घटना ने गांव की राजनीति और सामाजिक समीकरणों में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है।
अब देखना यह होगा कि आगे की जांच और कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में जाती है। फिलहाल बेलसोंडा में चर्चा का विषय यही है—
“कब्जे का किला ढहा, कानून की जीत हुई या राजनीति की बिसात बिछी?”
